होली पर सन्नाटा, परंपरा के कारण नहीं जलती होलिका
छत्तीसगढ़। भारत में होली का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है. देश के विभिन्न शहरों में इसे अलग-अलग तरह से मनाया जाता है. जहां वाराणसी में श्मशान में होली मनाया जाती है, तो वहीं मथुरा में फूलों से होली खेली जाती है. रंगों के इस पर्व पर लोगों का उत्साह देखते ही बनता है. छत्तीसगढ़ में भी इस त्योहार को शानदार तरीके से सेलिब्रेट किया जाता है. वहीं, कोरबा में एक ऐसा गांव भी है, जहां होली नहीं मनाई जाती है।
150 सालों से चली आ रही परंपरा
कोरबा जिले में स्थित खरहरी गांव, जहां 150 सालों से होली नहीं मनाई जा रही है. इस गांव में न तो होलिका दहन होता है न ही रंगों से खेला जाता है. ये दिन बिल्कुल आम दिनों तरह गुजरता है. होली न मनाने की परंपरा 150 सालों से निभाई जा रही है. गांव के लोग इसे भगवान का श्राप और चेतावनी के तौर पर देखते हैं।
क्या है पूरा मामला?
बताया जाता है कि 150 साल पहले खरहरी गांव में होलिका दहन के दिन अचानक भीषण आग लग गई थी. इस हादसे में कई घर जलकर खाक हो गए थे. गांव वालों का ये भी कहना है कि एक बार खरहरी गांव का एक व्यक्ति पास के गांव में होली खेलने गया था. जब वह वापस गांव में लौटा तो बीमार हो गया और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. इस घटना से ग्रामीण डर गए और संकेत माना गया।
ये भी एक धार्मिक मान्यता
कोरबा जिले के खरहरी गांव में होली ना मनाने को लेकर एक और धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है।
ऐसा कहा जाता है कि मड़वारानी मंदिर की देवी ने गांव वालों के सपने में आकर होली ना मनाने का संदेश दिया।
गांव में इस आदेश पर एकमत दिखाते हुए फैसला लिया गया कि होली नहीं मनाई जाएगी।
यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसे निभा रही है, जिसे आजतक तोड़ा नहीं गया है।

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