Oil Impact: बढ़ती तेल कीमतों के बीच बैंक क्रेडिट ग्रोथ ने पकड़ी रफ्तार
मुंबई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी ने न केवल आम उपभोक्ताओं की जेब पर असर डाला है, बल्कि औद्योगिक जगत का वित्तीय गणित भी बिगाड़ दिया है। वर्तमान वित्तीय वर्ष के शुरुआती दो महीनों के भीतर बैंकों में जमा राशि (डिपॉजिट) में गिरावट आने के बावजूद ऋण (क्रेडिट) की मांग में अप्रत्याशित उछाल दर्ज किया गया है। इस विपरीत रुख के कारण बैंकिंग प्रणाली में 'फंडिंग गैप' काफी बढ़ गया है, जिससे वित्तीय बाजारों में लिक्विडिटी (नकदी) की गंभीर किल्लत पैदा हो गई है। 31 मई तक लोन वितरण और जमा पूंजी के बीच की यह खाई बढ़कर लगभग 3.8 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गई है। बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज की इस तेज मांग के पीछे मुख्य रूप से देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां हैं, क्योंकि कच्चे तेल के दाम बढ़ने से उनके परिचालन मार्जिन पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और उन्हें अपनी तात्कालिक वित्तीय जरूरतों के लिए बैंकों से भारी कर्ज उठाना पड़ रहा है।
ऋण वितरण में रिकॉर्ड उछाल और जमा पूंजी में गिरावट
ताजा वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, 31 मई 2026 को समाप्त हुए पाक्षिक चक्र में बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ 17.7% के उच्च स्तर पर दर्ज की गई। यह चालू वित्त वर्ष का अब तक का सबसे उच्चतम स्तर होने के साथ-साथ जून 2024 के बाद से सालाना आधार पर देखी गई सबसे मजबूत वृद्धि भी है। 31 मार्च 2026 के बाद से बैंकों द्वारा दिए गए कुल बकाया कर्ज में 1.5 लाख करोड़ रुपये (0.7%) का इजाफा हुआ, जिससे कुल क्रेडिट का आंकड़ा 215.2 लाख करोड़ रुपये पर जा पहुंचा है। इसके विपरीत, इसी समयसीमा के भीतर बैंकों में जमा होने वाली धनराशि (डिपॉजिट) का ग्राफ नीचे गिरा है। मार्च के आखिर से अब तक कुल बैंक डिपॉजिट में 2.3 लाख करोड़ रुपये यानी 0.9% की कमी आई है, जिससे 31 मई 2026 तक कुल जमा राशि सिमटकर 260 लाख करोड़ रुपये रह गई है। इस तरह चालू वित्तीय वर्ष के महज दो महीनों में ही लोन और डिपॉजिट के बीच 3.8 लाख करोड़ रुपये का एक बड़ा अंतर पैदा हो गया है, जबकि इसके उलट बीते पूरे वित्त वर्ष के दौरान डिपॉजिट में 36.5 लाख करोड़ रुपये और क्रेडिट में 31.1 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो पहुंचा अपने उच्चतम स्तर के करीब
बैंकिंग क्षेत्र में जमा राशि की वृद्धि दर (डिपॉजिट ग्रोथ) में अमूमन बहुत बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है और यह ऐतिहासिक रूप से 9% से 13% के दायरे में ही बनी हुई है। हालांकि, 31 मई 2026 तक जमा वृद्धि दर जहां 12.2% पर रुकी थी, वहीं यह ऋण वृद्धि दर (क्रेडिट ग्रोथ) के मुकाबले पूरे 5 प्रतिशत पीछे चल रही थी। इस असंतुलन के परिणामस्वरूप अक्टूबर 2025 के बाद से ही देश का 'क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो' (सीडी रेशियो) लगातार 80% के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार बना हुआ है। मार्च 2026 के अंत में यह रेशियो 83% से अधिक के अपने रिकॉर्ड शिखर पर पहुंच गया था, जो कि मई 2026 के अंत तक मामूली गिरावट के साथ 82.8% पर दर्ज किया गया। तुलनात्मक रूप से देखें तो कोरोना महामारी के दौर में जब बाजार में नकदी की भारी बहुतायत थी, तब नवंबर 2021 में यह अनुपात गिरकर महज 69.6% के निचले स्तर पर आ गया था।
नकदी का संकट दूर करने के लिए बैलेंस शीट में फेरबदल
ऋण की इस निरंतर बढ़ती मांग को पूरा करने और बाजार में पूंजी का प्रवाह बनाए रखने के लिए व्यावसायिक बैंकों को अपनी बैलेंस शीट में बड़े रणनीतिक बदलाव करने पर मजबूर होना पड़ा है। बैंकों ने नए लोन बांटने के लिए फंड जुटाने के उद्देश्य से सरकारी प्रतिभूतियों (गवर्नमेंट सिक्योरिटीज) में किए जाने वाले अपने निवेश को काफी हद तक कम कर दिया है। यही वजह है कि जनवरी 2026 में ऐसी सरकारी होल्डिंग्स की ग्रोथ रेट गिरकर महज 2% के आसपास रह गई थी, हालांकि 31 मई 2026 तक इसमें मामूली सुधार देखा गया और यह 4.9% पर पहुंच गई। बांड और सरकारी निवेश में की जा रही यह कटौती स्पष्ट रूप से इस बात का संकेत है कि नई जमा पूंजी के अभाव में बैंकों को अपनी ब्लॉक लिक्विडिटी को हर हाल में फ्री करना पड़ रहा है, ताकि उद्योगों को दिए जाने वाले ऋण की रफ्तार प्रभावित न हो सके।

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