बीजेपी को मिला सबसे ज्यादा चंदा, कांग्रेस दूसरे तो आप तीसरे नंबर पर
नई दिल्ली। राष्ट्रीय दलों को मिले चंदे को लेकर एक रिपोर्ट जारी हुई है। रिपोर्ट में 2023-24 में बीजेपी को सबसे ज्यादा 4340.47 करोड़ रुपए का चंदा मिला था। कांग्रेस 1225.12 करोड़ रुपए के साथ दूसरे स्थान पर थी। रिपोर्ट में बताया गया कि राजनीतिक दलों को चंदे का बड़ा हिस्सा चुनावी बॉन्ड से मिला। बीजेपी ने अपनी कमाई का 50.96 फीसदी यानी 2211.69 करोड़ रुपए खर्च किया, जबकि कांग्रेस ने 83.69 फीसदी यानी 1025.25 करोड़ रुपए खर्च किए। आम आदमी पार्टी को 22.68 करोड़ का चंदा मिला था, लेकिन उसने इससे ज्यादा 34.09 करोड़ खर्च किए थे।
सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मिले कुल चंदे का 74.57 फीसदी अकेले बीजेपी को मिला। शेष पांच दलों को कुल 25.43 फीसदी चंदा मिला। बीजेपी को चुनावी बॉन्ड से 1685.63 करोड़ रुपए मिले, जबकि कांग्रेस को 828.36 करोड़ और आप को 10.15 करोड़ रुपए मिले। कुल मिलाकर इन तीनों दलों को 2524.1361 करोड़ रुपए यानी अपने कुल चंदे का 43.36 फीसदी चुनावी बॉन्ड से मिला है।
बता दें सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल मई में चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। रिपोर्ट में भारतीय स्टेट बैंक ने बताया कि 2023-24 में कई राजनीतिक दलों ने 4507.56 करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड भुनाए। राष्ट्रीय दलों ने इस फंड का 55.99 फीसदी यानी 2524.1361 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।
सीपीआई (एम) को 167.636 करोड़ रुपए का चंदा मिला, जिसमें से उसने 127.283 करोड़ खर्च किए। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 64.7798 करोड़ मिले और उसने 43.18 करोड़ खर्च किए। नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) को 0.2244 करोड़ मिले और उसने 1.139 करोड़ खर्च किए। कांग्रेस ने सबसे ज्यादा खर्च 619.67 करोड़ रुपए चुनाव प्रचार पर किए। इसके अलावा प्रशासनिक और अन्य खर्चों पर 340.702 करोड़ रुपए खर्च किए।
सीपीआई (एम) ने प्रशासनिक और अन्य कार्यों में 56.29 करोड़ रुपए और पार्टी के कर्मचारियों पर 47.57 करोड़ रुपए खर्च किए। कांग्रेस 58.56 करोड़ रुपए और सीपीआई (एम) 11.32 करोड़ रुपए ने कूपन की बिक्री से कुल 69.88 करोड़ रुपए की आमदनी दर्ज की। बीजेपी, कांग्रेस और सीपीआई (एम) की ऑडिट रिपोर्ट 12 से 66 दिनों की देरी से पेश की गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय दलों के सबसे आम खर्च चुनाव प्रचार और प्रशासनिक गतिविधियों पर होते हैं। यह रिपोर्ट राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता पर प्रकाश डालती है और दर्शाती है कि किस प्रकार चुनावी बॉन्ड ने दलों की आय को प्रभावित किया है।

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