बुखार-खांसी से बेहाल बच्चे, भोपाल के अस्पतालों की ओपीडी में बढ़ी भीड़
भोपाल। राजधानी भोपाल में मौसम के मिजाज में आए बदलाव के कारण बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर देखने को मिल रहा है। शहर के अस्पतालों में सर्दी-जुकाम, खांसी और तेज बुखार से पीड़ित बच्चों की संख्या में भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। जयप्रकाश (जेपी) जिला अस्पताल की बाल रोग ओपीडी में रोजाना लगभग 175 से 200 बच्चे इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। इनमें से कई बच्चों में लंबे समय तक बुखार रहने, सांस लेने में तकलीफ होने और लगातार खांसी की शिकायतें सामने आ रही हैं। डॉक्टरों के अनुसार ओपीडी में आने वाले मरीजों में से रोजाना करीब 15 से 20 बच्चों में निमोनिया के शुरुआती लक्षण पाए जा रहे हैं।
बुखार के तापमान से ज्यादा बच्चे के व्यवहार पर दें ध्यान
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राकेश भार्गव ने अभिभावकों को सतर्क करते हुए सलाह दी है कि बीमारी की गंभीरता का आकलन केवल बुखार के थर्मामीटर रीडिंग या तापमान से न करें।
उन्होंने बताया कि बुखार उतरने के बाद यदि बच्चा सामान्य रूप से एक्टिव है, खेल-कूद रहा है और सही तरीके से खान-पान ले रहा है, तो स्थिति सामान्य हो सकती है। इसके विपरीत, यदि बुखार कम होने के बावजूद बच्चा अत्यधिक सुस्त, चिड़चिड़ा, कमजोर या लगातार रोता हुआ दिखे, तो इसे नजरअंदाज किए बिना तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। वायरल संक्रमण की स्थिति में आमतौर पर 72 घंटे तक बुखार बना रह सकता है, इसलिए शुरुआती तीन दिनों में घबराने के बजाय बच्चे की गतिविधियों पर पैनी नजर रखना बेहद जरूरी है।
वायरल के बाद निमोनिया और बैक्टीरियल संक्रमण का बढ़ता जोखिम
चिकित्सकों के मुताबिक बच्चों में शुरुआती वायरल इंफेक्शन के बाद द्वितीयक (सेकेंडरी) बैक्टीरियल संक्रमण पनपने का जोखिम रहता है, जिससे स्थिति निमोनिया में बदल जाती है।
तेज बुखार के साथ लगातार खांसी, तेजी से सांस चलना, पसलियां चलना, अत्यधिक शारीरिक कमजोरी और आहार न लेना निमोनिया के गंभीर चेतावनी संकेत हैं। केवल जेपी अस्पताल ही नहीं, बल्कि भोपाल स्थित श्वसन रोग संस्थान की ओपीडी में भी रोजाना निमोनिया से पीड़ित 4 से 5 बच्चे पहुंच रहे हैं, जिन्हें विशेष चिकित्सीय देखभाल की आवश्यकता पड़ रही है।
बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक और सिरप देने से बचें
अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञों ने बच्चों को बिना डॉक्टरी पर्चे के सीधे मेडिकल स्टोर से दवाएं लेकर देने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
अभिभावक अक्सर अपने मन से एंटीबायोटिक या कफ सिरप खरीदकर बच्चों को पिला देते हैं, जिसकी सही खुराक (डोज़) न होने के कारण आगे चलकर दवाओं का असर कम हो जाता है या साइड इफेक्ट्स का खतरा बढ़ जाता है। डॉ. भार्गव ने स्पष्ट रूप से कहा कि चार साल से कम उम्र के बच्चों को बिना सलाह के कोई भी मिश्रित कफ सिरप, एंटीबायोटिक या इंजेक्शन नहीं देना चाहिए। बुखार नियंत्रण के लिए पैरासिटामोल की खुराक भी बच्चे के उम्र और वजन के हिसाब से तय होती है, इसलिए किसी भी प्रकार की दवा देने से पूर्व योग्य चिकित्सक की सलाह लेना अनिवार्य है।

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