सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग तेज, भारत ने देरी के लिए जिम्मेदार देशों पर साधा निशाना
न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार की धीमी रफ्तार पर भारत ने एक बार फिर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पार्वथनेनी हरीश ने कहा कि 17 दौर की बैठकों के बाद भी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है और यह सुधार प्रक्रिया कुछ देशों के व्यक्तिगत व विभाजनकारी हितों की बंधक बनकर नहीं रह सकती।
18वें साल में पहुंची सुधार प्रक्रिया
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सुरक्षा परिषद में सुधार से जुड़ी अंतर-सरकारी वार्ता (आईजीएन) को अगले सत्र तक बढ़ा दिया है, जिससे यह प्रक्रिया अब 18वें वर्ष में प्रवेश कर गई है। सितंबर में शुरू होने वाले महासभा के 81वें सत्र में इस मुद्दे पर दोबारा चर्चा की जाएगी। भारतीय प्रतिनिधि ने भारतीय दर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि आत्मा को तो कई जन्मों के बाद मोक्ष मिल जाता है, लेकिन 17 चक्र पूरे होने के बावजूद यूएनएससी सुधार का कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा।
स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग
भारत का मानना है कि सुरक्षा परिषद में वास्तविक बदलाव तभी आएगा जब स्थायी और अस्थायी—दोनों ही श्रेणियों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए। केवल अस्थायी सीटें बढ़ाने से वर्तमान पांच स्थायी सदस्यों (P5) के एकाधिकार में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। भारत ने मांग की है कि बातचीत एक लिखित मसौदे के आधार पर निश्चित समयसीमा के भीतर होनी चाहिए और इसमें 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
2028-29 की अस्थायी सीट के लिए भारत की दावेदारी
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीट हेतु भारत के अभियान की शुरुआत कर दी है। अगले वर्ष जून में होने वाले चुनाव में एशिया-प्रशांत समूह की इस सीट के लिए भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से होगा। भारत इससे पहले आठ बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है, जिसमें उसका पिछला कार्यकाल 2021-22 में था।

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